मंगलवार, 24 अप्रैल 2012

यादों को बन्दी बनाया है, मैंने !


यादों को बन्दी बनाया है, मैंने !
उनकी,
आँखों में आशियाना था, मेरा !
जिनकी,
बस, मिलते ही यादों को,
जुदाई की सजा,
यादों को, घसीट लाया,
निर्ममता से,
दिल की कठोर दीवारों में !
बन्दी बनाया,  
अँधेरी काल कोठरी में !
करुणा का लगाकर ताला,
विरह खाने में दिया,
कभी अपशब्द,
तो कभी कुण्ठाघात किया,
न जाने, सश्रम कितने काम लिए,
कभी लिखवाई कविताएँ,
कभी नित- नये लेख लिए,
यातनाएँ सहते-सहते,
सिहर उठी यादें,
उमगं, शितिल हुई,
मानो शांत बीहर हुई !
अब, यादें सोचती है.....
न जाने, वो पल कब आएगा,
जब हमे, इस दिल के
बन्दीगृह से कोई आकर,
हमे मुक्ति दिलाएगा !
या फिर.....
हम कैद रहेगे तब तक ...
जब तक, इस देह का अंत होगा,
यह शरीर पंचतत्व में विलीन होगा,
चिता की अग्नि से ..
जलेगी ये, दिल की,
अँधेरी काल कोठरी.....
तब...
यादें हो जायेगी,
सदा के लिए.....
आजाद” !
 ......यशपाल सिंह “एडवोकेट”
लेखतिथि :- २४-०४-२०१२ ई० 

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